अमरेंद्र कुमार राय, करनाल (7DayzNews)। बिहार में मंगलवार 11 नवंबर को दूसरे और आखिरी दौर का मतदान होना है। लेकिन उससे एक दिन पहले सोमवार को दिल्ली में लाल किले के पास एक चलती कार में बम विस्फोट हुआ जिसमें नौ लोगों की मृत्यु की खबर है। अब सवाल उठता है कि क्या इन दोनों घटनाओं का कोई आपसी संबंध है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद देश की राजनीति का ढांचा काफी बदला है। उनकी सरकार हर घटना को एक “कार्यक्रम” के रूप में प्रस्तुत करती है — जैसे इससे पहले न तो ऐसा हुआ और न आगे कभी होगा। हर बात में पिछले सत्तर सालों से तुलना की जाती है और पूर्व प्रधानमंत्रियों नेहरू या इंदिरा गांधी से मुकाबला किया जाता है।
नेहरू पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने “कई गलतियां” कीं, और इंदिरा गांधी के साहस की बराबरी करने का दावा किया जाता है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या वर्तमान नेतृत्व वही ताकत दिखा पा रहा है जो इतिहास में दिखी थी? जब देश के एक राज्य मणिपुर में हिंसा जारी हो और प्रधानमंत्री संसद में जवाब न दें तो ताकत की परिभाषा क्या रह जाती है?
पुलवामा की घटना के बाद से कई लोगों के मन में यह शंका बनी हुई है कि क्या चुनावी लाभ के लिए इस तरह की घटनाओं का इस्तेमाल किया जाता है। जब मोदी विपक्ष में थे, तो सवाल उठाते थे कि आतंकवादी देश में प्रवेश कैसे करते हैं — अब वही सवाल खुद उनकी सरकार से पूछा जा रहा है।
2019 के चुनाव से पहले पुलवामा की घटना हुई और फिर बड़े पैमाने पर “घर में घुसकर मारेंगे” जैसे नारे चले। उसके बाद हुए चुनाव में बीजेपी को पहले से भी अधिक सीटें मिलीं। इसी तरह, 2024 में भी चुनाव से ठीक पहले पहलगाम की घटना सामने आई, जिसके बाद “ऑपरेशन सिंदूर” और “तिरंगा यात्रा” जैसे अभियान शुरू हुए।
अब जब बिहार में मतदान है और दिल्ली में विस्फोट हुआ है तो फिर वही सवाल सामने है:
क्या यह भी एक संयोग है या राजनीतिक लाभ की रणनीति?
इसका जवाब शायद 14 नवंबर को आए नतीजों के बाद ही मिलेगा।